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इस सभी की शुरूआत 1999 में हुई जब मैं यू.ए.ई. में आया था तथा आबू धाबी हवाई अड्डे पर उतरा था। हालांकि मैं आबू धाबी जाने के लिए इतना उत्सुक नहीं था, लेकिन मैंने इस प्रस्ताव को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि मैंने अभी हाल ही में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी तथा मेरे पास विकल्प चुनने की योग्यता नहीं थी। आपको सच्चाई बताऊं तो मैं हमेशा से ही जीवन के मूल्यों के प्रति नास्तिकता की ही सोच रखता था, मेरी बहन मुझे दुबई से यह बताया करती थी कि वे गुरू महाराज जी के सत्संग को एक सप्ताह में एक बार सुनते हैं। मैंने गुरू महाराज जी की तस्वीर भी नहीं देखी थी तथा उन्हें जानता भी नहीं था। मेरा धार्मिक बनने की तथा सत्संग सुनने की कोई इतनी इच्छा भी नहीं थी।
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